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99
وَمِنَ الأَعرابِ مَن يُؤمِنُ بِاللَّهِ وَاليَومِ الآخِرِ وَيَتَّخِذُ ما يُنفِقُ قُرُباتٍ عِندَ اللَّهِ وَصَلَواتِ الرَّسولِ ۚ أَلا إِنَّها قُربَةٌ لَهُم ۚ سَيُدخِلُهُمُ اللَّهُ في رَحمَتِهِ ۗ إِنَّ اللَّهَ غَفورٌ رَحيمٌ

फ़ारूक़ ख़ान & नदवी

और कुछ देहाती तो ऐसे भी हैं जो ख़ुदा और आख़िरत पर ईमान रखते हैं और जो कुछ खर्च करते है उसे ख़ुदा की (बारगाह में) नज़दीकी और रसूल की दुआओं का ज़रिया समझते हैं आगाह रहो वाक़ई ये (ख़ैरात) ज़रूर उनके तक़र्रुब (क़रीब होने का) का बाइस है ख़ुदा उन्हें बहुत जल्द अपनी रहमत में दाख़िल करेगा बेशक ख़ुदा बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है