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Sura 5
Aya 29
29
إِنّي أُريدُ أَن تَبوءَ بِإِثمي وَإِثمِكَ فَتَكونَ مِن أَصحابِ النّارِ ۚ وَذٰلِكَ جَزاءُ الظّالِمينَ

फ़ारूक़ ख़ान & नदवी

मैं तो ज़रूर ये चाहता हूं कि मेरे गुनाह और तेरे गुनाह दोनों तेरे सर हो जॉए तो तू (अच्छा ख़ासा) जहन्नुमी बन जाए और ज़ालिमों की तो यही सज़ा है