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4
فَمَن لَم يَجِد فَصِيامُ شَهرَينِ مُتَتابِعَينِ مِن قَبلِ أَن يَتَماسّا ۖ فَمَن لَم يَستَطِع فَإِطعامُ سِتّينَ مِسكينًا ۚ ذٰلِكَ لِتُؤمِنوا بِاللَّهِ وَرَسولِهِ ۚ وَتِلكَ حُدودُ اللَّهِ ۗ وَلِلكافِرينَ عَذابٌ أَليمٌ

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

किन्तु जिस किसी को ग़ुलाम प्राप्त न हो तो वह निरन्तर दो माह रोज़े रखे, इससे पहले कि वे दोनों एक-दूसरे को हाथ लगाएँ और जिस किसी को इसकी भी सामर्थ्य न हो तो साठ मुहताजों को भोजन कराना होगा। यह इसलिए कि तुम अल्लाह और उसके रसूल पर ईमानवाले सिद्ध हो सको। ये अल्लाह की निर्धारित की हुई सीमाएँ है। और इनकार करनेवाले के लिए दुखद यातना है