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85
ثُمَّ أَنتُم هٰؤُلاءِ تَقتُلونَ أَنفُسَكُم وَتُخرِجونَ فَريقًا مِنكُم مِن دِيارِهِم تَظاهَرونَ عَلَيهِم بِالإِثمِ وَالعُدوانِ وَإِن يَأتوكُم أُسارىٰ تُفادوهُم وَهُوَ مُحَرَّمٌ عَلَيكُم إِخراجُهُم ۚ أَفَتُؤمِنونَ بِبَعضِ الكِتابِ وَتَكفُرونَ بِبَعضٍ ۚ فَما جَزاءُ مَن يَفعَلُ ذٰلِكَ مِنكُم إِلّا خِزيٌ فِي الحَياةِ الدُّنيا ۖ وَيَومَ القِيامَةِ يُرَدّونَ إِلىٰ أَشَدِّ العَذابِ ۗ وَمَا اللَّهُ بِغافِلٍ عَمّا تَعمَلونَ

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

फिर तुम वही हो कि अपने लोगों की हत्या करते हो और अपने ही एक गिरोह के लोगों को उनकी बस्तियों से निकालते हो; तुम गुनाह और ज़्यादती के साथ उनके विरुद्ध एक-दूसरे के पृष्ठपोषक बन जाते हो; और यदि वे बन्दी बनकर तुम्हारे पास आते है, तो उनकी रिहाई के लिए फिद्ए (अर्थदंड) का लेन-देन करते हो जबकि उनको उनके घरों से निकालना ही तुम पर हराम था, तो क्या तुम किताब के एक हिस्से को मानते हो और एक को नहीं मानते? फिर तुममें जो ऐसा करें उसका बदला इसके सिवा और क्या हो सकता है कि सांसारिक जीवन में अपमान हो? और क़यामत के दिन ऐसे लोगों को कठोर से कठोर यातना की ओर फेर दिया जाएगा। अल्लाह उससे बेखबर नहीं है जो कुछ तुम कर रहे हो