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33
وَلا تَقتُلُوا النَّفسَ الَّتي حَرَّمَ اللَّهُ إِلّا بِالحَقِّ ۗ وَمَن قُتِلَ مَظلومًا فَقَد جَعَلنا لِوَلِيِّهِ سُلطانًا فَلا يُسرِف فِي القَتلِ ۖ إِنَّهُ كانَ مَنصورًا

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

किसी जीव की हत्या न करो, जिसे (मारना) अल्लाह ने हराम ठहराया है। यह और बात है कि हक़ (न्याय) का तक़ाज़ा यही हो। और जिसकी अन्यायपूर्वक हत्या की गई हो, उसके उत्तराधिकारी को हमने अधिकार दिया है (कि वह हत्यारे से बदला ले सकता है), किन्तु वह हत्या के विषय में सीमा का उल्लंघन न करे। निश्चय ही उसकी सहायता की जाएगी