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31
وَما جَعَلنا أَصحابَ النّارِ إِلّا مَلائِكَةً ۙ وَما جَعَلنا عِدَّتَهُم إِلّا فِتنَةً لِلَّذينَ كَفَروا لِيَستَيقِنَ الَّذينَ أوتُوا الكِتابَ وَيَزدادَ الَّذينَ آمَنوا إيمانًا ۙ وَلا يَرتابَ الَّذينَ أوتُوا الكِتابَ وَالمُؤمِنونَ ۙ وَلِيَقولَ الَّذينَ في قُلوبِهِم مَرَضٌ وَالكافِرونَ ماذا أَرادَ اللَّهُ بِهٰذا مَثَلًا ۚ كَذٰلِكَ يُضِلُّ اللَّهُ مَن يَشاءُ وَيَهدي مَن يَشاءُ ۚ وَما يَعلَمُ جُنودَ رَبِّكَ إِلّا هُوَ ۚ وَما هِيَ إِلّا ذِكرىٰ لِلبَشَرِ

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

और हमने उस आग पर नियुक्त रहनेवालों को फ़रिश्ते ही बनाया है, और हमने उनकी संख्या को इनकार करनेवालों के लिए मुसीबत और आज़माइश ही बनाकर रखा है। ताकि वे लोग जिन्हें किताब प्रदान की गई थी पूर्ण विश्वास प्राप्त करें, और वे लोग जो ईमान ले आए वे ईमान में और आगे बढ़ जाएँ। और जिन लोगों को किताब प्रदान की गई वे और ईमानवाले किसी संशय मे न पड़े, और ताकि जिनके दिलों मे रोग है वे और इनकार करनेवाले कहें, "इस वर्णन से अल्लाह का क्या अभिप्राय है?" इस प्रकार अल्लाह जिसे चाहता है पथभ्रष्ट कर देता है और जिसे चाहता हैं संमार्ग प्रदान करता है। और तुम्हारे रब की सेनाओं को स्वयं उसके सिवा कोई नहीं जानता, और यह तो मनुष्य के लिए मात्र एक शिक्षा-सामग्री है