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145
قُل لا أَجِدُ في ما أوحِيَ إِلَيَّ مُحَرَّمًا عَلىٰ طاعِمٍ يَطعَمُهُ إِلّا أَن يَكونَ مَيتَةً أَو دَمًا مَسفوحًا أَو لَحمَ خِنزيرٍ فَإِنَّهُ رِجسٌ أَو فِسقًا أُهِلَّ لِغَيرِ اللَّهِ بِهِ ۚ فَمَنِ اضطُرَّ غَيرَ باغٍ وَلا عادٍ فَإِنَّ رَبَّكَ غَفورٌ رَحيمٌ

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

कह दो, "जो कुछ मेरी ओर प्रकाशना की गई है, उसमें तो मैं नहीं पाता कि किसी खानेवाले पर उसका कोई खाना हराम किया गया हो, सिवाय इसके लिए वह मुरदार हो, यह बहता हुआ रक्त हो या ,सुअर का मांस हो - कि वह निश्चय ही नापाक है - या वह चीज़ जो मर्यादा से हटी हुई हो, जिसपर अल्लाह के अतिरिक्त किसी और का नाम लिया गया हो। इसपर भी जो बहुत विवश और लाचार हो जाए; परन्तु वह अवज्ञाकारी न हो और न हद से आगे बढ़नेवाला हो, तो निश्चय ही तुम्हारा रब अत्यन्त क्षमाशील, दयाबान है।"